यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥ 13.30 ॥
जिस क्षण यह पुरुष भूतों के पृथक-पृथक भाव को एक ही (परमात्मा) में स्थित देखता है और उस एक से ही सबका विस्तार देखता है, उसी क्षण वह ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।
विस्तृत व्याख्या: यह 'अद्वैत' का शिखर है। जब साधक यह देख लेता है कि संसार की अनंत विविधता (पेड़, मनुष्य, पशु, ग्रह) वास्तव में एक ही आधारभूत शक्ति से पैदा हुई है और अंत में उसी में समा जाती है, तब उसकी दृष्टि से 'भेद' मिट जाता है। जैसे सोने के अलग-अलग गहने अलग दिखते हैं पर सब 'सोना' ही हैं, वैसे ही सब कुछ परमात्मा ही है—यह बोध होते ही मनुष्य साक्षात ब्रह्ममय हो जाता है।