॥ अध्याय 13, श्लोक 31 ॥

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः ।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥ 13.31 ॥

धार्मिक व्याख्या

हे कुन्तीपुत्र! अनादि होने से और निर्गुण होने से यह अविनाशी परमात्मा शरीर में स्थित होने पर भी वास्तव में न कुछ करता है और न ही लिप्यमान (प्रभावित) होता है।

विस्तृत व्याख्या: जैसे सूर्य का प्रतिबिंब कीचड़ के पानी में पड़ने पर भी सूर्य गंदा नहीं होता, वैसे ही परमात्मा शरीर के भीतर रहकर भी शरीर के रोगों, बुढ़ापे या पाप-पुण्य से अछूता रहता है। वह 'अव्यय' है, यानी उसमें कोई कमी या बढ़ोत्तरी नहीं होती। वह केवल एक साक्षी की तरह शरीर में निवास करता है।

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