यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥ 13.33 ॥
हे भारत! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस संपूर्ण ब्रह्मांड को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही आत्मा (क्षेत्री) संपूर्ण क्षेत्र (शरीर) को प्रकाशित करती है।
विस्तृत व्याख्या: जैसे सूर्य के प्रकाश के बिना दुनिया की कोई चीज दिखाई नहीं दे सकती, वैसे ही आत्मा की चेतना के बिना शरीर की कोई इंद्रिय काम नहीं कर सकती। आँखें तभी देखती हैं और कान तभी सुनते हैं जब उनके पीछे आत्मा का 'प्रकाश' (चेतना) होता है। यह श्लोक बताता है कि आत्मा ही शरीर का एकमात्र ऊर्जा स्रोत है।