॥ अध्याय 13, श्लोक 5 ॥

महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥ 13.5 ॥

धार्मिक व्याख्या

पाँच महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश), अहंकार, बुद्धि और मूल प्रकृति (अव्यक्त); दस इंद्रियाँ, एक मन और इंद्रियों के पाँच विषय (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) - यह सब क्षेत्र का स्वरूप है।

विस्तृत व्याख्या: इस श्लोक में भगवान 'क्षेत्र' यानी इस दृश्य जगत और शरीर के भौतिक घटकों का वर्णन कर रहे हैं। सांख्य दर्शन के अनुसार इन 24 तत्वों से ही जड़ प्रकृति का निर्माण होता है। मनुष्य का स्थूल शरीर और सूक्ष्म मन इन्हीं तत्वों का मेल है, जो आत्मा (क्षेत्रज्ञ) से पूरी तरह भिन्न है।

वापस जाएँ