॥ अध्याय 13, श्लोक 6-7 ॥

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः ।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥ 13.6-7 ॥

धार्मिक व्याख्या

इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल शरीर का पिंड (संघात), चेतना और धृति (धैर्य)—इस प्रकार यह 'क्षेत्र' अपने विकारों सहित संक्षेप में कहा गया है।

विस्तृत व्याख्या: पिछले श्लोक में भौतिक तत्वों को बताने के बाद, यहाँ भगवान मन के विकारों और शरीर की अवस्थाओं को भी 'क्षेत्र' का ही हिस्सा बता रहे हैं। हम अक्सर सुख-दुःख या इच्छा को आत्मा का गुण मान लेते हैं, लेकिन भगवान स्पष्ट करते हैं कि ये भी प्रकृति के बदलाव (विकार) मात्र हैं। आत्मा इन सबका केवल साक्षी (Observer) है, वह इनसे प्रभावित नहीं होती।

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