॥ अध्याय 13, श्लोक 8-12 ॥

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च ।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ॥
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥

धार्मिक व्याख्या

इन श्लोकों में भगवान वास्तविक 'ज्ञान' के 20 लक्षणों का वर्णन कर रहे हैं: विनम्रता (मान का त्याग), दम्भहीनता, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरु-सेवा, शुद्धि, स्थिरता, आत्म-संयम, इन्द्रियों के विषयों में वैराग्य, अहंकार का अभाव, जीवन के दुखों (जन्म-मृत्यु) का बार-बार चिंतन, अनासक्ति, परिवार और घर में मोह का अभाव, सुख-दुःख में समभाव, ईश्वर में अनन्य भक्ति, एकांत का सेवन, सांसारिक शोर-शराबे से दूर रहना, अध्यात्म में निष्ठा और तत्वज्ञान के लक्ष्य रूप परमात्मा का दर्शन।

विस्तृत व्याख्या: भगवान यहाँ ज्ञान की परिभाषा बदल देते हैं। उनके लिए ज्ञान पुस्तकों को पढ़ना नहीं, बल्कि अपने चरित्र को पवित्र बनाना है। ये 20 गुण वह सीढ़ी हैं जिनसे मनुष्य 'क्षेत्र' (शरीर) के मोह से निकलकर 'क्षेत्रज्ञ' (आत्मा/परमात्मा) का साक्षात्कार करता है। जो इन गुणों से रहित है, वह चाहे कितना भी पढ़ा-लिखा क्यों न हो, भगवान की दृष्टि में 'अज्ञानी' ही है।

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