उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥ 15.10 ॥
शरीर को छोड़ते हुए, शरीर में स्थित रहते हुए अथवा विषयों को भोगते हुए, गुणों से युक्त इस आत्मा को अज्ञानी जन नहीं देख पाते; केवल वे ही देख पाते हैं जिनके पास ज्ञान रूपी नेत्र हैं।
विस्तृत व्याख्या: आत्मा हमेशा शरीर के भीतर मौजूद रहती है, लेकिन हम उसे देख नहीं पाते क्योंकि हमारी दृष्टि केवल जड़ (Matter) पर अटकी होती है। भगवान कहते हैं कि आत्मा के इस प्रवास और उसकी उपस्थिति को समझने के लिए 'ज्ञान-चक्षु' की आवश्यकता होती है, जो अभ्यास और विवेक से प्राप्त होते हैं।