यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥
जो तेज सूर्य में स्थित होकर संपूर्ण जगत को प्रकाशित करता है, जो चंद्रमा में है और जो अग्नि में है—उस तेज को तू मेरा ही जान। मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब भूतों को धारण करता हूँ और मैं ही रसस्वरूप चंद्रमा होकर संपूर्ण औषधियों (वनस्पतियों) को पुष्ट करता हूँ।
विस्तृत व्याख्या: भगवान यहाँ अपनी सर्वव्यापकता बता रहे हैं। वे केवल स्वर्ग में नहीं बैठे हैं, बल्कि सूर्य की रोशनी, पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति और पौधों के विकास में छिपी जीवन शक्ति के रूप में वे ही मौजूद हैं। सारा ब्रह्मांड उनकी ऊर्जा (तेज) से ही चल रहा है।