॥ अध्याय 15, श्लोक 18 ॥

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ 15.18 ॥

धार्मिक व्याख्या

चूँकि मैं क्षर (नाशवान) से अतीत हूँ और अक्षर (अविनाशी आत्मा) से भी उत्तम हूँ, इसलिए लोक में और वेदों में भी 'पुरुषोत्तम' नाम से प्रसिद्ध हूँ।

विस्तृत व्याख्या: 'पुरुषोत्तम' शब्द दो शब्दों से बना है—पुरुषों में जो उत्तम है। भगवान यहाँ स्पष्ट कर रहे हैं कि उनकी महिमा अनंत है और वे ही समस्त शास्त्रों के केंद्र हैं। यह श्लोक भक्त को भगवान की सर्वोच्च स्थिति पर पूर्ण विश्वास दिलाता है।

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