॥ अध्याय 15, श्लोक 3-4 ॥

न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिङ्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥

धार्मिक व्याख्या

इस वृक्ष का स्वरूप यहाँ (संसार में) जैसा कहा गया है वैसा नहीं मिलता, क्योंकि न इसका आदि है, न अंत है और न ही इसकी स्थिति है। इसलिए इस अत्यंत दृढ़ जड़ों वाले अश्वत्थ वृक्ष को 'वैराग्य' रूपी सुदृढ़ शस्त्र द्वारा काटकर उस परम पद की खोज करनी चाहिए, जहाँ गए हुए पुरुष फिर लौटकर संसार में नहीं आते। जिस आदि पुरुष परमेश्वर से इस पुरातन संसार की रचना हुई है, मैं उसी की शरण में हूँ—ऐसा निश्चय करके उस परमात्मा का ध्यान करना चाहिए।

विस्तृत व्याख्या: यह संसार एक मायावी जाल की तरह है जिसका कोई सिरा नहीं दिखता। इसे केवल एक ही हथियार से काटा जा सकता है—'असङ्ग' यानी वैराग्य और अनासक्ति। जब हम संसार की नश्वरता को समझकर मोह छोड़ देते हैं, तभी हम उस परम पुरुष (परमात्मा) की खोज कर पाते हैं जहाँ पहुँचने के बाद फिर कभी जन्म-मृत्यु के दुखों में नहीं गिरना पड़ता।

वापस जाएँ