शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥
वायु जैसे फूलों से गंध को ग्रहण करके एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाती है, वैसे ही जीवात्मा (देह का स्वामी) जिस शरीर को त्यागती है, वहाँ से इन इंद्रियों और मन को साथ लेकर नए शरीर में प्रवेश करती है। यह जीवात्मा कान, आँख, त्वचा, रसना और नासिका तथा मन के आश्रय से ही विषयों का उपभोग करती है।
विस्तृत व्याख्या: यहाँ पुनर्जन्म की प्रक्रिया समझाई गई है। मृत्यु के समय शरीर खत्म होता है, लेकिन मन के संस्कार और इंद्रियों की सूक्ष्म शक्तियाँ आत्मा के साथ अगले शरीर में चली जाती हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप एक कमरा छोड़कर दूसरे कमरे में जाते समय अपना सामान साथ ले जाते हैं।