श्रीभगवानुवाच :
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः ।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥
अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता ।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥
श्रीभगवान ने कहा: भय का सर्वथा अभाव, अंतःकरण की शुद्धि, ज्ञान के लिए योग में दृढ़ स्थिति, दान, इंद्रियों का दमन, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और सरलता। अहिंसा, सत्य, क्रोध न करना, त्याग, शांति, चुगली न करना, सब भूतों पर दया, लोभ का अभाव, कोमलता, लज्जा और चंचलता का अभाव। तेज, क्षमा, धैर्य, बाहर-भीतर की शुद्धि, किसी में शत्रु भाव न होना और अपने में पूज्यता के अभिमान का अभाव—ये सब दैवीय सम्पदा को प्राप्त पुरुष के लक्षण हैं।
विस्तृत व्याख्या: यहाँ भगवान ने 26 दैवीय गुणों की सूची दी है। ये गुण मनुष्य के चरित्र को निखारते हैं और उसे अध्यात्म के मार्ग पर दृढ़ करते हैं। इनमें 'अभय' (डर न होना) को सबसे पहले रखा गया है क्योंकि बिना निडरता के अन्य किसी भी सत्य का पालन करना कठिन है।