इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् ।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥
वे सोचते हैं—'आज मैंने यह पा लिया है, अब इस इच्छा को पूरा करूँगा। मेरे पास इतना धन है और भविष्य में यह और भी हो जाएगा। वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया और अन्यों को भी मैं मार डालूँगा। मैं ही ईश्वर हूँ, मैं भोगी हूँ, मैं सिद्ध हूँ, बलवान और सुखी हूँ। मैं बड़ा धनवान और बड़े कुटुम्ब वाला हूँ, मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा और मौज करूँगा'—इस प्रकार वे अज्ञान से मोहित रहते हैं।
विस्तृत व्याख्या: इन श्लोकों में 'अहं' (Ego) का नग्न प्रदर्शन है। आसुरी स्वभाव का व्यक्ति अपनी उपलब्धियों पर इतना अंधा हो जाता है कि उसे लगता है कि वह सर्वशक्तिमान है। वह अपनी धन-दौलत और कुल के घमंड में दूसरों को तुच्छ समझने लगता है। उसका दान और यज्ञ भी केवल दिखावे और नाम के लिए होता है।