॥ अध्याय 16, श्लोक 17-18 ॥

आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः ।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ॥
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।
मामप्रदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥

धार्मिक व्याख्या

अपने-आप को ही श्रेष्ठ मानने वाले, घमंडी, धन और मान के मद में चूर वे लोग केवल नाम मात्र के यज्ञों द्वारा पाखंड से शास्त्रविधि रहित पूजन करते हैं। वे अहंकार, बल, गर्व, काम और क्रोध के आश्रित होकर अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझ परमात्मा से द्वेष करते हैं और दूसरों की निंदा करते हैं।

विस्तृत व्याख्या: भगवान यहाँ स्पष्ट कर रहे हैं कि जो व्यक्ति दूसरों का अपमान करता है या उन्हें दुःख पहुँचाता है, वह वास्तव में उनके भीतर बैठे परमात्मा का अपमान कर रहा है। ऐसे लोगों का धार्मिक कार्य (यज्ञ/पूजा) भी केवल लोक-दिखावे के लिए होता है, उसमें श्रद्धा नहीं होती।

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