॥ अध्याय 16, श्लोक 19-20 ॥

तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् ।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥

धार्मिक व्याख्या

उन द्वेष करने वाले, क्रूर और संसार के अधम अपवित्र मनुष्यों को मैं बार-बार आसुरी योनियों में ही गिराता हूँ। हे कौन्तेय! वे मूढ़ पुरुष जन्म-जन्मांतर तक आसुरी योनियों को प्राप्त होकर मुझे प्राप्त न करके, उससे भी अधिक नीच गति को प्राप्त होते हैं।

विस्तृत व्याख्या: यहाँ कर्मफल के अटूट नियम की बात हो रही है। यदि कोई व्यक्ति लगातार नकारात्मकता और क्रूरता का चुनाव करता है, तो प्रकृति की व्यवस्था (ईश्वर की इच्छा) उसे ऐसे ही परिवेश और योनियों में भेजती है जहाँ वह अपनी उन प्रवृत्तियों के साथ रहता है। यह तब तक चलता है जब तक कि उसे विवेक जाग्रत न हो जाए।

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