॥ अध्याय 16, श्लोक 21-22 ॥

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः ।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥

धार्मिक व्याख्या

काम (Lust), क्रोध (Anger) तथा लोभ (Greed)—ये तीन प्रकार के नरक के द्वार हैं, जो आत्मा का नाश करने वाले (पतन की ओर ले जाने वाले) हैं। इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए। हे कौन्तेय! जो मनुष्य इन तीनों तमोद्वारों से मुक्त हो जाता है, वह अपने कल्याण का आचरण करता है और उससे परम गति को प्राप्त होता है।

नरक के तीन मुख्य द्वार: काम, क्रोध और लोभ।

विस्तृत व्याख्या: ये तीन विकार ही आसुरी प्रवृत्तियों की जड़ हैं। जब मनुष्य इन पर विजय पा लेता है, तो उसकी बुद्धि सात्विक हो जाती है और वह स्वतः ही उस मार्ग पर चलने लगता है जो उसे ईश्वर (IIT-Bombay जैसे ऊँचे लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए एकाग्रता) की ओर ले जाता है।

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