दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।
मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥ 16.5 ॥
दैवीय सम्पदा मुक्ति के लिए मानी गई है और आसुरी सम्पदा बंधन के लिए। हे पाण्डव! तू शोक मत कर, क्योंकि तू दैवीय सम्पदा को लेकर ही उत्पन्न हुआ है।
विस्तृत व्याख्या: यहाँ भगवान अर्जुन को सांत्वना दे रहे हैं कि वह एक सात्विक और दैवीय गुणों वाला योद्धा है। दैवीय गुण हमें मोह और संसार के चक्र से मुक्त (Liberate) करते हैं, जबकि आसुरी प्रवृत्तियाँ हमें वासनाओं और दुखों की बेड़ियों में जकड़ लेती हैं।