॥ अध्याय 16, श्लोक 7 ॥

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥ 16.7 ॥

धार्मिक व्याख्या

आसुरी स्वभाव वाले मनुष्य यह नहीं जानते कि क्या करना चाहिए (प्रवृत्ति) और क्या नहीं करना चाहिए (निवृत्ति)। उनमें न तो बाहर-भीतर की शुद्धि होती है, न श्रेष्ठ आचरण और न ही सत्य होता है।

विस्तृत व्याख्या: आसुरी प्रवृत्ति का मुख्य लक्षण भ्रम है। उन्हें लगता है कि जो उन्हें सुख दे रहा है वही सही है। उनके जीवन में अनुशासन और शुद्धि का अभाव होता है और वे अपनी सुविधानुसार झूठ का सहारा लेते हैं।

वापस जाएँ