एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः ।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः ।
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥
इस मिथ्या दृष्टि को स्वीकार करके, जिनका स्वभाव नष्ट हो गया है और जिनकी बुद्धि मन्द है, वे उग्र कर्म करने वाले क्रूर लोग जगत के विनाश के लिए ही पैदा होते हैं। वे कभी न पूर्ण होने वाली कामनाओं का आश्रय लेकर, पाखण्ड, घमण्ड और मद से चूर होकर मोहवश गलत सिद्धांतों को ग्रहण करते हैं और भ्रष्ट आचरण वाले होकर संसार में बरतते हैं।
विस्तृत व्याख्या: यहाँ भगवान उन लोगों की चेतावनी दे रहे हैं जो अपनी शक्ति और वासना के नशे में अंधे होकर दूसरों को दुःख पहुँचाते हैं। ऐसी मानसिकता अंततः समाज और प्रकृति के विनाश का कारण बनती है। उनके संकल्प अशुद्ध होते हैं और वे केवल दिखावे के लिए कर्म करते हैं।