॥ अध्याय 17, श्लोक 11-13 ॥

अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥ 17.11 ॥
अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥ 17.12 ॥
विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥ 17.13 ॥

सात्विक यज्ञ: जो यज्ञ शास्त्रविधि के अनुसार, फल की इच्छा न रखने वाले पुरुषों द्वारा 'यज्ञ करना कर्तव्य है'—ऐसा मन को स्थिर करके किया जाता है, वह सात्विक है।
राजसिक यज्ञ: हे भरतश्रेष्ठ! जो यज्ञ फल को ध्यान में रखकर अथवा केवल पाखंड (दिखावे) के लिए किया जाता है, उसे तू राजस जान।
तामसिक यज्ञ: जो यज्ञ शास्त्रविधि से रहित, जिसमें अन्न का दान न हो, जो मंत्रहीन और बिना श्रद्धा के किया जाता है, उसे तामस यज्ञ कहते हैं।
[Image comparing a selfless spiritual ritual (Sattvic) with a grand showy display (Rajasic) and a chaotic undisciplined act (Tamasic)] वापस जाएँ