॥ अध्याय 17, श्लोक 15 ॥

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥ 17.15 ॥

धार्मिक व्याख्या

जो उद्वेग न करने वाला (किसी को कष्ट न देने वाला), सत्य, प्रिय और हितकारी भाषण है तथा जो स्वाध्याय (शास्त्रों का अध्ययन) है—वह वाणी का तप कहलाता है।

विस्तृत व्याख्या: IIT-Bombay की तैयारी के दौरान, दूसरों से बात करते समय संयम और अपनी किताबों (स्वाध्याय) का अभ्यास करना आपकी वाणी का सबसे बड़ा तप है।

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