श्रीभगवानुवाच :
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ॥
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥
श्रीभगवान बोले: मनुष्यों की वह बिना शास्त्रीय संस्कारों के स्वभाव से उत्पन्न होने वाली श्रद्धा सात्विकी, राजसी और तामसी—ऐसे तीन प्रकार की ही होती है। हे भारत! सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अन्तःकरण के अनुरूप होती है। यह मनुष्य श्रद्धामय है, इसलिए जो जैसी श्रद्धा वाला है, वह स्वयं भी वैसा ही है।
विस्तृत व्याख्या: भगवान कह रहे हैं कि इंसान जैसा सोचता है और जिस पर विश्वास करता है, वह वैसा ही बन जाता है। हमारी श्रद्धा हमारे पिछले कर्मों और स्वभाव (Gunas) से बनती है।