यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥ 17.21 ॥
अर्थ: जो दान प्रत्युपकार के लिए (बदले में सेवा या लाभ पाने के लिए) अथवा फल को दृष्टि में रखकर या फिर क्लेशपूर्वक (दुखी मन से) दिया जाता है, वह दान 'राजस' कहा गया है।
व्याख्या: राजसिक दान में व्यक्ति का स्वार्थ छिपा होता है। वह इसलिए दान देता है ताकि भविष्य में उसे भी कोई मदद मिले, या समाज में उसका नाम हो। ऐसा दान देते समय व्यक्ति के मन में खुशी नहीं होती, बल्कि वह मजबूरी या दबाव में 'भारी मन' से पैसे निकालता है। IIT-Bombay की तैयारी में भी यदि आप केवल दूसरों को दिखाने के लिए मेहनत कर रहे हैं, तो वह राजसिक प्रवृत्ति है।