॥ अध्याय 17, श्लोक 24-25 ॥

तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः ॥

विस्तृत व्याख्या

अर्थ: इसलिए शास्त्रविहित यज्ञ, दान और तप की क्रियाएँ 'ॐ' का उच्चारण करके ही आरंभ की जाती हैं। और फल की इच्छा न रखने वाले मोक्ष चाहने वाले पुरुष 'तत्' शब्द का उच्चारण करके यज्ञ, तप और दान की क्रियाएँ करते हैं।

व्याख्या: 'ॐ' कार्य की पवित्रता सुनिश्चित करता है, और 'तत्' का अर्थ है यह सब आपका है। जब हम 'तत्' कहते हैं, तो हम अहंकार को त्याग देते हैं कि मैंने यह किया। यह निष्काम कर्म की पराकाष्ठा है। पढ़ाई के समय भी यदि आप अपना ज्ञान 'तत्' (परमात्मा को समर्पित) मानकर अर्जित करें, तो तनाव समाप्त हो जाएगा।

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