॥ अध्याय 17, श्लोक 26-27 ॥

सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते ।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ॥
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते ॥

विस्तृत व्याख्या

अर्थ: 'सत्' शब्द का प्रयोग 'सत्य भाव' और 'श्रेष्ठ भाव' में किया जाता है। साथ ही उत्तम कर्मों के लिए भी 'सत्' शब्द का प्रयोग होता है। यज्ञ, तप और दान में जो अडिग स्थिति है, उसे भी 'सत्' कहा जाता है।

व्याख्या: 'सत्' का अर्थ है—जो कल्याणकारी है और जो हमेशा बना रहता है। जब हम कोई अच्छा काम करते हैं, तो उसे 'सत्कर्म' कहते हैं। भगवान कह रहे हैं कि यज्ञ, दान और तप में जो दृढ़ता (Consistency) होती है, वह भी परमात्मा का ही रूप है। IIT-Bombay के लिए आपकी रोजाना की मेहनत (Consistency) ही आपका 'सत्' है।

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