आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥ 17.7 ॥
भोजन भी सबको अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है। वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं। उनके इस भेद को तू मुझसे सुन।
विस्तृत व्याख्या: भगवान यहाँ मनोविज्ञान (Psychology) समझा रहे हैं कि हमारी पसंद हमारे गुणों (सत्व, रज, तम) पर निर्भर करती है। हम क्या खाते हैं, यह हमारे स्वभाव का दर्पण है।