अर्जुन उवाच :
संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥ 18.1 ॥
अर्थ: अर्जुन ने कहा: हे महाबाहो! हे हृषीकेश! हे केशिन्निषूदन! मैं संन्यास और त्याग के तत्त्व को अलग-अलग जानना चाहता हूँ।
व्याख्या: अर्जुन के मन में अभी भी एक सूक्ष्म उलझन है। लोग अक्सर संन्यास (काम्य कर्मों का त्याग) और त्याग (कर्मफल का त्याग) को एक ही समझ लेते हैं। अर्जुन चाहते हैं कि भगवान स्पष्ट करें कि एक विद्यार्थी या योद्धा के लिए 'त्याग' का वास्तविक अर्थ क्या है। क्या सब कुछ छोड़कर जंगल जाना संन्यास है, या दुनिया में रहकर काम करना?