न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥ 18.10 ॥
अर्थ: जो पुरुष न तो अरुचिकर कर्म से द्वेष करता है और न ही सुखदायक कर्म में आसक्त होता है—वह सत्वगुण से युक्त, बुद्धिमान, संशयरहित त्यागी है।
गहन विश्लेषण: एक सच्चा त्यागी वह है जिसका मन स्थिर है। उसे पढ़ाई का कोई कठिन चैप्टर (अकुशल कर्म) परेशान नहीं करता और न ही वह आसान विषयों (कुशल कर्म) में डूबकर समय बर्बाद करता है। वह हर परिस्थिति में समान रहता है। उसकी बुद्धि (मेधा) इतनी स्पष्ट होती है कि उसे अपने मार्ग पर कोई संदेह (Doubt) नहीं रहता।