॥ अध्याय 18, श्लोक 11 ॥

न ही देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥ 18.11 ॥

विस्तृत व्याख्या

अर्थ: किसी भी देहधारी (शरीर धारण करने वाले) मनुष्य के लिए सभी कर्मों को पूरी तरह त्याग देना संभव नहीं है। इसलिए, जो मनुष्य 'कर्म के फल' का त्याग करता है, वास्तव में वही 'त्यागी' कहलाता है।

गहन विश्लेषण: भगवान एक बहुत व्यावहारिक (Practical) बात कह रहे हैं। जब तक शरीर है, आप कर्म से बच नहीं सकते—साँस लेना, खाना, सोचना भी कर्म है। इसलिए मैं कुछ नहीं करूँगा कहना ढोंग है। असली त्याग बाहरी नहीं, मानसिक है। IIT-Bombay की तैयारी करते हुए आप पढ़ाई छोड़ नहीं सकते, लेकिन उसके 'रिजल्ट' की चिंता छोड़कर केवल वर्तमान क्षण में जीना ही असली त्याग है।

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