अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥ 18.12 ॥
अर्थ: कर्म का फल तीन प्रकार का होता है—अनिष्ट (बुरा), इष्ट (अच्छा) और मिश्र (मिला-जुला)। जो लोग फल का त्याग नहीं करते, उन्हें मृत्यु के बाद ये फल भोगने पड़ते हैं, लेकिन फल का त्याग करने वाले संन्यासियों को कभी नहीं।
गहन विश्लेषण: यहाँ बताया गया है कि जो लोग फल की इच्छा से काम करते हैं, वे कर्मों के जाल में फंस जाते हैं। कभी उन्हें सफलता मिलती है, कभी असफलता और कभी दोनों का मिश्रण। लेकिन जो फल की चिंता छोड़कर केवल कर्तव्य भाव से कार्य करते हैं, वे इन मानसिक द्वंद्वों (Ups and Downs) से मुक्त हो जाते हैं।
| फल का प्रकार | अर्थ |
|---|---|
| अनिष्ट (Anishta) | जो हमें पसंद न हो (जैसे असफलता) |
| इष्ट (Ishta) | जो हमें प्रिय हो (जैसे सफलता) |
| मिश्र (Mishra) | सुख और दुःख का मिश्रण |