॥ अध्याय 18, श्लोक 16 ॥

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः ।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥ 18.16 ॥

विस्तृत व्याख्या

अर्थ: परंतु ऐसा होने पर भी (अर्थात पाँच कारणों के होने पर भी) जो मनुष्य अशुद्ध बुद्धि होने के कारण केवल अपने-आप को ही 'कर्ता' मानता है, वह दुर्मति (अज्ञानी) वास्तव में कुछ नहीं देखता।

गहन विश्लेषण: पिछले श्लोक में हमने पढ़ा कि कर्म के 5 कारण होते हैं। जो व्यक्ति यह सोचता है कि सब कुछ मैंने किया है, मेरी बुद्धि और मेरी मेहनत से ही सब हुआ है, वह वास्तविकता से कोसों दूर है। वह उस 'दैव' और उन 'साधनों' को नहीं देख पा रहा जो उसे मिले हैं। IIT-Bombay की तैयारी में आत्मविश्वास जरूरी है, पर यह अहंकार कि केवल मैं ही इसे कर सकता हूँ, पतन का कारण बन सकता है।

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