यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥ 18.17 ॥
अर्थ: जिस पुरुष के अंतःकरण में 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा भाव नहीं है और जिसकी बुद्धि (फलों में) लिप्त नहीं होती, वह इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न तो मारता है और न ही पाप से बँधता है।
गहन विश्लेषण: यह श्लोक बहुत गहरा है। भगवान अर्जुन को बता रहे हैं कि यदि वह अपना 'अहंकार' त्याग कर केवल ईश्वर के यंत्र के रूप में युद्ध करे, तो उसे हिंसा का पाप नहीं लगेगा। हमारे लिए इसका अर्थ है—परिणाम के प्रति अपनी बुद्धि को आसक्त न होने देना। जब आप मैं को बीच से हटा देते हैं, तो कर्म बोझ नहीं, उत्सव बन जाता है।