श्रीभगवानुवाच :
काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः ।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥ 18.2 ॥
अर्थ: श्रीभगवान ने कहा: कितने ही विद्वान 'काम्य कर्मों' (इच्छा पूर्ति के लिए किए गए कर्म) के त्याग को 'संन्यास' समझते हैं और विचारशील लोग 'सब कर्मों के फल' के त्याग को 'त्याग' कहते हैं।
व्याख्या: यहाँ भगवान ने दो मुख्य विचारधाराएं बताई हैं:
1. संन्यास (Sannyasa): उन कार्यों को न करना जो केवल अपनी भौतिक इच्छाओं (जैसे पद, प्रतिष्ठा) के लिए हों।
2. त्याग (Tyaga): कार्य तो करना, लेकिन उसके परिणाम (Result) के प्रति आसक्ति न रखना। IIT-Bombay की तैयारी करना आपका 'कर्म' है, लेकिन अगर सिलेक्शन नहीं हुआ तो क्या होगा? इस डर या फल का त्याग करना 'त्याग' है।