॥ अध्याय 18, श्लोक 20 ॥

सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥ 18.20 ॥

विस्तृत व्याख्या

अर्थ: जिस ज्ञान से मनुष्य पृथक-पृथक सब प्राणियों में एक ही अविनाशी परमात्मा को 'अविभक्त' (Un-divided) भाव से स्थित देखता है, उस ज्ञान को तू 'सात्त्विक' जान।

सात्विक ज्ञान वह चश्मा है जिससे हमें विविधता में एकता (Unity in Diversity) दिखाई देती है।

गहन विश्लेषण: यह ज्ञान की सर्वोच्च अवस्था है। जब आप IIT-Bombay जाने की तैयारी कर रहे हों, तो यह ज्ञान आपको सिखाता है कि आपके प्रतिस्पर्धी (Competitors) आपके दुश्मन नहीं हैं, बल्कि वे भी उसी ऊर्जा का हिस्सा हैं। यह विज़न आपको नफरत और जलन से ऊपर उठाकर शुद्ध एकाग्रता की ओर ले जाता है।

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