यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥ 18.35 ॥
अर्थ: हे पार्थ! जिस धृति के द्वारा दुष्ट बुद्धि वाला मनुष्य निद्रा (आलस्य), भय, शोक, विषाद और अहंकार को भी नहीं छोड़ता, वह धृति 'तामसी' है।
तामसिक धृति वास्तव में 'हठ' (Stubbornness) है। यह वह शक्ति है जो मनुष्य को गलत चीजों को पकड़े रहने के लिए मजबूर करती है। तामसिक व्यक्ति अपने दुख, अपनी चिंताओं और अपनी बुरी आदतों को छोड़ना ही नहीं चाहता।
वह सोने (आलस्य) में ही सुख मानता है और हमेशा पुराने शोकों या भविष्य के डरों में डूबा रहता है। इसे 'दुर्मेधा' (मलीन बुद्धि) कहा गया है क्योंकि वह अपनी विनाशकारी प्रवृत्तियों को ही अपना स्वभाव मान लेता है और सुधार की कोई कोशिश नहीं करता।