यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥
भावार्थ: जो सुख आरंभ में और अंत में भी आत्मा को मोह में डालने वाला है, वह निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न सुख 'तामस' कहा गया है।
विस्तृत व्याख्या: तामसिक सुख वास्तव में पतन का कारण है। इसमें मनुष्य को कुछ न करने, केवल सोने या आलस्य में डूबे रहने में मजा आता है। वह सच्चाई को देखना ही नहीं चाहता और भ्रम (मोह) में जीता है। यह सुख न तो शुरुआत में अच्छा है और न ही इसका परिणाम सुखद होता है; यह आत्मा की प्रगति को पूरी तरह रोक देता है।