न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥
भावार्थ: पृथ्वी पर, या स्वर्ग में देवताओं के बीच भी ऐसा कोई प्राणी नहीं है, जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीन गुणों (सत्व, रज, तम) से मुक्त हो।
विस्तृत व्याख्या: भगवान यहाँ संसार की प्रकृति समझा रहे हैं। समस्त ब्रह्मांड इन तीन गुणों का मिश्रण है। कोई भी जीव इनसे अछूता नहीं है। आध्यात्मिक मार्ग का अर्थ ही इन गुणों को समझकर सत्व गुण में स्थित होना और अंततः इनसे ऊपर उठकर परमात्मा में विलीन होना है।