॥ अध्याय 18, श्लोक 45 ॥

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥ 18.45 ॥

धार्मिक व्याख्या

भावार्थ: अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्परता से लगा हुआ मनुष्य परम सिद्धि (परमात्मा की प्राप्ति) को प्राप्त कर लेता है। अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य किस प्रकार सिद्धि प्राप्त करता है, उसे अब तू सुन।

विस्तृत व्याख्या: भगवान यहाँ एक बहुत बड़ी राहत देते हैं। मोक्ष पाने के लिए हिमालय जाने की जरूरत नहीं है। यदि एक व्यक्ति अपने स्वभाव के अनुसार मिले हुए कार्य को ईश्वर की पूजा मानकर पूरी निष्ठा से करता है, तो वह भी उसी ऊँचाई को प्राप्त करता है जो एक तपस्वी को मिलती है।

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