॥ अध्याय 18, श्लोक 46 ॥

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥ 18.46 ॥

धार्मिक व्याख्या

भावार्थ: जिस परमेश्वर से संपूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत व्याप्त है, उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त कर लेता है।

विस्तृत व्याख्या: यह श्लोक कर्मयोग का सार है। भगवान कहते हैं कि आपको भक्ति के लिए काम छोड़ने की जरूरत नहीं है। जैसे एक फूल अपनी खुशबू फैलाकर ईश्वर की सेवा करता है, वैसे ही आप अपना कर्तव्य ईमानदारी से निभाकर ईश्वर की अर्चना कर सकते हैं। जब कार्य 'स्वार्थ' के लिए नहीं बल्कि 'ईश्वर के अर्पण' होकर किया जाता है, तो वही कार्य पूजा बन जाता है।

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