सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥ 18.48 ॥
भावार्थ: हे कुन्तीपुत्र! दोषयुक्त होने पर भी अपने सहज कर्म (स्वभावज कर्म) का त्याग नहीं करना चाहिए; क्योंकि जैसे अग्नि धुएँ से ढकी रहती है, वैसे ही सभी कर्म किसी न किसी दोष से ढके रहते हैं।
विस्तृत व्याख्या: दुनिया में कोई भी काम 100% परफेक्ट या दोषरहित नहीं होता। जैसे आग के साथ धुआँ होता ही है, वैसे ही हर काम में थोड़ी बहुत कमी हो सकती है। इसलिए काम में कोई छोटी कमी देखकर उसे छोड़ना नहीं चाहिए। महत्वपूर्ण यह है कि आप उस काम को किस भाव (ईश्वर भक्ति) से कर रहे हैं।