यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥ 18.5 ॥
अर्थ: यज्ञ, दान और तप रूपी कर्म त्यागने योग्य नहीं हैं, बल्कि उन्हें निश्चित रूप से करना चाहिए। क्योंकि यज्ञ, दान और तप बुद्धिमान मनुष्यों को भी पवित्र करने वाले हैं।
व्याख्या: कई बार हमें लगता है कि अध्यात्म का मतलब काम छोड़ना है, लेकिन भगवान कहते हैं कि श्रेष्ठ कर्म (यज्ञ, दान, तप) तो ऋषि-मुनियों के हृदय को भी शुद्ध करते हैं। एक विद्यार्थी के लिए, अपनी पूरी ऊर्जा के साथ अध्ययन करना ही उसका 'तप' है।