बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥
भावार्थ: विशुद्ध बुद्धि से युक्त, धैर्य के द्वारा मन को वश में करके, शब्दादि विषयों का त्याग कर, राग-द्वेष को नष्ट कर, एकांत का सेवन करने वाला, अल्पहारी, वाणी-शरीर-मन को जीतने वाला, निरंतर ध्यानयोग में स्थित और वैराग्य का आश्रय लेने वाला मनुष्य; अहंकार, बल, गर्व, काम, क्रोध और संग्रह का त्याग कर, ममता रहित और शांत होकर 'ब्रह्म' होने का पात्र बन जाता है।
विस्तृत व्याख्या: इन श्लोकों में भगवान ने उस 'चेकलिस्ट' का वर्णन किया है जो एक साधक को मोक्ष के द्वार तक ले जाती है। यहाँ केवल बाहरी त्याग नहीं, बल्कि मानसिक शुद्धि पर जोर दिया गया है। जब मनुष्य अपनी ऊर्जा को बाहरी दुनिया के झगड़ों और इच्छाओं से समेटकर भीतर की ओर (ध्यान में) लगाता है, तब वह अपनी छोटी पहचान (अहंकार) को छोड़कर विराट 'ब्रह्म' के साथ एक होने के योग्य हो जाता है।