सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥ 18.56 ॥
भावार्थ: मेरे आश्रित रहने वाला भक्त समस्त कर्मों को सदा करता हुआ भी मेरी कृपा से सनातन अविनाशी पद (परम धाम) को प्राप्त कर लेता है।
विस्तृत व्याख्या: भगवान यहाँ एक बहुत बड़ी राहत और आश्वासन दे रहे हैं। वे कहते हैं कि यदि तुम पूरी तरह 'मेरे' आश्रित हो, तो तुम्हें कर्मों के फलों की चिंता करने की जरूरत नहीं है। चाहे तुम संसार के कोई भी कार्य कर रहे हो, यदि तुम्हारा मन मुझमें लगा है, तो मेरी कृपा (प्रसाद) तुम्हें उस स्थान पर ले जाएगी जहाँ कभी कोई दुख नहीं है। यह 'शरणागति' की शक्ति है।