मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।
अथ चेत्त्वमहङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ॥ 18.58 ॥
भावार्थ: मुझमें चित्त लगाकर तुम मेरी कृपा से समस्त कठिनाइयों (संकटों) को पार कर जाओगे; परंतु यदि तुम अहंकार के कारण मेरी बात नहीं सुनोगे, तो तुम्हारा विनाश हो जाएगा।
विस्तृत व्याख्या: यह भगवान की एक गंभीर चेतावनी है। यदि हम अपना दिमाग ईश्वर में लगाते हैं, तो वे हमारे जीवन के हर दुर्ग (किले या मुश्किल रुकावट) को पार करा देते हैं। लेकिन यदि हमें यह भ्रम हो जाए कि मैं सब जानता हूँ या मैं अकेला ही कर सकता हूँ (अहंकार), तो हम सही रास्ता भटक जाते हैं, जो अंततः आध्यात्मिक और मानसिक पतन की ओर ले जाता है।