॥ अध्याय 18, श्लोक 59-60 ॥

यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥

धार्मिक व्याख्या

भावार्थ: अहंकार का आश्रय लेकर जो तुम यह मान रहे हो कि 'मैं युद्ध नहीं करूँगा', तुम्हारा यह निश्चय मिथ्या (झूठा) है; क्योंकि तुम्हारी क्षत्रिय प्रकृति तुम्हें युद्ध में लगा देगी। हे कुन्तीपुत्र! अपने स्वभाव से उत्पन्न जिस कर्म को तुम मोहवश नहीं करना चाहते, उसे भी तुम विवश होकर करोगे।

विस्तृत व्याख्या: भगवान अर्जुन को एक बहुत बड़ा सत्य बता रहे हैं—'स्वभाव की शक्ति'। अर्जुन एक क्षत्रिय है, उसका स्वभाव वीरता और अन्याय के विरुद्ध लड़ना है। मोह के कारण वह युद्ध से भागना चाहता है, लेकिन जैसे ही युद्ध शुरू होगा, उसका क्षत्रिय रक्त उसे बैठने नहीं देगा। हम सब अपने पूर्व कर्मों और स्वभाव से बंधे हैं। इसलिए भगवान कहते हैं कि लड़ना तो तुम्हें पड़ेगा ही, तो क्यों न अहंकार छोड़कर 'मेरे' लिए लड़ो?

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