तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥ 18.62 ॥
भावार्थ: हे भारत! तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण में जा। उनकी कृपा से ही तू परम शांति को और सनातन अविनाशी पद (परम धाम) को प्राप्त होगा।
विस्तृत व्याख्या: अर्जुन को और हम सबको भगवान यही सलाह दे रहे हैं कि अपनी बुद्धि और बल का अहंकार छोड़कर उस परमात्मा को समर्पित हो जाओ। सर्वभावेन का अर्थ है—मन, वचन और कर्म से पूरी तरह। जब हम ईश्वर की शरण लेते हैं, तो उनकी कृपा (प्रसाद) हमारे सारे दुखों को हर लेती है और हमें वह शांति मिलती है जो कभी खत्म नहीं होती।