॥ अध्याय 18, श्लोक 63 ॥

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया ।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥ 18.63 ॥

धार्मिक व्याख्या

भावार्थ: इस प्रकार यह गोपनीय से भी अति गोपनीय ज्ञान मैंने तुझसे कह दिया है। अब तू इस पर पूर्ण रूप से विचार कर और जैसा तू चाहे, वैसा ही कर।

विस्तृत व्याख्या: यह श्लोक भगवान की महानता को दर्शाता है। सारा उपदेश देने के बाद भी वे अर्जुन पर दबाव नहीं डालते। वे उसे स्वतंत्रता देते हैं कि वह इस ज्ञान पर विचार करे। हिंदू धर्म की यही सुंदरता है—ईश्वर आपको सोचने और समझने का मौका देते हैं, आदेश नहीं थोपते।

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