सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥
भावार्थ: सब गोपनीयों से अत्यंत गोपनीय मेरे परम वचन को तू फिर सुन। तू मेरा अत्यंत प्रिय मित्र है, इसलिए मैं यह हितकारी बात तुझसे कह रहा हूँ—मुझमें मन वाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन कर और मुझे नमस्कार कर। ऐसा करने से तू निश्चित रूप से मुझे ही प्राप्त होगा, यह मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ।
विस्तृत व्याख्या: इन श्लोकों में भगवान का अपने भक्त के प्रति अगाध प्रेम झलकता है। वे अर्जुन को अपना 'प्रिय' कहते हैं और उसे सफलता की गारंटी देते हैं। यदि हम अपना मन भगवान को दे दें, उनके प्रति समर्पित हो जाएँ, तो वे हमें हर हाल में अपना बना लेते हैं। यह गीता का वह मधुर संदेश है जो डर पर नहीं, बल्कि प्रेम पर आधारित है।