सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ 18.66 ॥
भावार्थ: सब धर्मों को (अर्थात सभी कर्तव्यों के फलों और आश्रयों को) त्यागकर केवल मेरी ही शरण में आ जा। मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर।
विस्तृत व्याख्या: यह गीता का 'चरम श्लोक' है। यहाँ 'धर्म त्यागने' का मतलब कर्म छोड़ना नहीं, बल्कि उस बोझ को छोड़ना है कि मैं करने वाला हूँ। जब मनुष्य अपनी सारी चिंताएं, योजनाएं और डर भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित कर देता है, तो भगवान स्वयं उसके योग-क्षेम का भार उठा लेते हैं। यह श्लोक अर्जुन के साथ-साथ हर उस छात्र के लिए भी है जो अपने लक्ष्य (जैसे IIT-Bombay) के लिए मेहनत कर रहा है—तुम अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करो और परिणाम की चिंता मुझ पर छोड़ दो।