कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।
कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय ॥ 18.72 ॥
भावार्थ: हे पार्थ! क्या तूने इस उपदेश को एकाग्र चित्त से सुना? और हे धनञ्जय! क्या तेरा अज्ञान से उत्पन्न हुआ मोह अब पूरी तरह नष्ट हो गया है?
विस्तृत व्याख्या: एक आदर्श शिक्षक की तरह, श्रीकृष्ण अर्जुन से पुष्टि कर रहे हैं कि क्या ज्ञान हृदय तक पहुँचा। यह श्लोक एकाग्रता (Focus) के महत्व को दर्शाता है। बिना एकाग्रता के सुना गया ज्ञान मोह को नष्ट नहीं कर सकता।